गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

महर्षि चरक एवं चरक संहिता-21- अनुवासन

गतांक से आगे...........
अत एवौषधगनात्संकल्प्यमनुवासनम .
मरुपघ्नमिति प्रोक्तं संग्रह: पान्चकर्मिक (१४)
अनुवासन-जिन औषधियों का उपदेश बस्ती कर्म के लिए किया गया है, वात नाशक होने से उनका ही अनुवासन वस्ति के लिए भी प्रयोग करना चाहिए.
इस प्रकार नस्य, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, इन पांचों शोधन कर्मो के लिए संक्षेप में औषधियों का उपदेश कर दिया गया है.जिन रोगियों के शरीर में दोष संचित हों, उनको दूर करने के लिए स्नेहन और स्वेदन कराकर मात्र और काल का विचार करते हुए, शिरोविरेचन,वमन,विरेचन,निरुहण, और अन्वासन, इन पॉँच कर्मो का प्रयोग करें,क्योंकि युक्ति, योग, या उक्त कर्मों का प्रयोग मात्र और काल पर निर्भर है.सफलता प्रयोग पर आश्रित है. इस युक्ति (उचित प्रयोग) को जानने वाला वैद्य ही केवल द्रव्यादी के नाम और गुण जानने वालों से भी उपर प्रतिष्ठा पाता है.
पंच कर्म कराने से पहले स्नेहन एवं स्वेदन करना चाहिए.
जारी है...................
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बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

महर्षि चरक एवं चरक संहिता 20 - विरेचक द्रव्य

गतांक से आगे..........
त्रिवृताम् त्रिफलाम दंतीं निलिनीम सप्त्लाम वचाम
कम्पिल्कम गवाक्षीं च क्षीरणिमुदकीर्यकाम (९)

विरेचक द्रव्य -- त्रिवृता (त्रिवि, निसोत), त्रिफला, (हरड, बहेडा, आंवला), दंती (जमाल घोटा), नीलिनी (नील), सप्तला(सातला), वचा (वच), कम्पीलक( कमीला) गवाक्षी (इन्द्रायण), क्षीरणी (हरी दुधली, दुग्धिका, दूधी, चोक), उद्कीर्यका( वृक्ष करंज, कंजा, नाटा, करंज, करन्जुआ), पीलू, आरग्वध, (अमलतास) द्राक्षा (मुनक्का), द्रवन्ति (बड़ी दंती, जमाल घोटे का बड़ा भेद), निचुल (हिज्जल फल, समुद्र फल),  इन औषधियों का प्रयोग पक्काशय के विद्यमान दोष को विरेचन द्वारा बाहर निकलने  के लिए करें, इनमे से त्रिवृत, दंती, नीलिनी, सातला, वाच, इन्द्रायण, दूधी, बड़ी दंती, इनकी जड़ और त्रिफला, कमीला , करंज, पीलू, अमलतास, दाख, समुद्र फल, इनका फल प्रयोग में आता है.
त्रिवृत सबसे उत्तम विरेचन कारी द्रव्य है. पक्काशय गत दोष का तात्पर्य है, पक्काशय में जो दुष्ट पित्त, या कफांश है, जिसका विरेचन द्वारा निकलना उचित हो,
 जारी है..............
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महर्षि चरक एवं चरका संहिता-19- वस्ती देने योग्य द्रव्य

गतांक से आगे...........
पाटलीं च अग्नि मन्थम च बिल्वं श्योनाकमेव च.
काश्मर्यम शाल पर्णी च पृश्नीपर्णी निदिग्धिकाम (११)

वस्ति देने योग्य द्रव्य- पाटला (पाढ़, पाढ़ल), अग्नि मन्य(अरणी), विल्व (बेल, बेलगिरी), श्योनाक (अर्लू, टेंटू, सोना पाठा), काश्मर्थ (गाम्भारी, धमार),शाल पर्णी ( सालवन), पृश्नीपर्णी ( पृष्टपर्णी,पीठापर्णी, पिठ्वनी), निदिग्धा (छोटी कटेरी, कन्तेली, भट कटैया), बला(खरैटी),  श्र्वदंष्ट्रा (गोखरू), वृहती (बड़ी कंटेली ), एरंड, पुनर्नवा (सांठी, आटा-साटा), यव (जौ) कूल्त्थ (कुल्थी) कोल (बदर,बेर) गुडूची (गिलोय, गुलुच) मदन (मैनफल) पलाश (ढाक) कतृण (गंधतृण, रोहिषतृण), और चार स्नेह (घी, तेल, चर्बी और मज्जा) और पांचों प्रकार के लवण तथा मल मूत्र के अवरोध में आस्थापन अर्थात वस्ति कर्म के लिए परयोग करें.
जारी है.
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सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

महर्षि चरक एवं चरक संहिता-18- अध्याय २-वमन कारक द्रव्य

गतांक से आगे...........
मदनं मधुकं निम्बं जिमूतं कृतवेधनं.
पिपलीकूटजेक्ष्वाकूणयेला धामार्गवाणी (७)
उपस्थिते श्लेषमपित्ते व्याधावामाशयाश्रये
वमनार्थम प्रत्यंजीत भीषग्देहमदुषयम (८)
वमन कारक द्रव्य- मदन (मैन फल), मधुक (मुलैठी) निम्ब (नीम), जीमूत (कडुई, तुरई, देवदाली), कृत्वेधन (तोरई) पीप्प्ली (पिपली), कूताज (कूड़ा ,इन्द्रजौ) इक्ष्वाकु ( कडुआ तुम्बा), एला ( बड़ी इलायची), धामागर्व (कडुई तुरई) इन औषधियों  अमाशय में श्लेषपित्त की व्याधि हो, तब वैद्य इस प्रकार करे कि देह में व्याधि उत्पन्न ना हो.
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रविवार, 25 अक्टूबर 2009

महर्षि चरक एवं चरक संहिता-१७- अध्याय २- शिरोविरेचन-अपामार्ग तंडूलीय

गतांक से आगे............
अध्याय  २.
इस अध्याय का नाम "अपामार्ग तंडूलीय"है. इसके विवरण हेतु भगवान आत्रेय ने उपदेश किया हिल
अपमार्गास्य बीजानि पिपप्लीर्मरिचानि च .
विडंगान्याथ शिग्रुणि सर्व्पंस्तुम्बूरुणि च ..(३)
शिरोविरेचन द्रव्य- अपामार्ग, (औंगा, चिरचिटा, पूठकंडा), के बीज, पिप्पली (पीपल, बड़ी, छोटी), मिर्च (काली मिर्च, गोल, या सफ़ेद,) विडंग(वाय विडंग), शिग्रु (सहजने के बीज), सर्षप( सरसों के बीज), तुम्बुरु (नेपाली धनिया,तुमरू) अजाजी (जीरा), अजगंधा( अजमोद) पीलू (पीलू के बीज), एला (छोटी इलायची) हरेणुका (रेणुका, मेहँदी के बीज, सुगंध द्रव्य) पृथ्वीका (बड़ी इलायची के बीज), सुरसा (तुलसी के बीज), स्वेता (अपराजता, सफ़ेद कोयल) कुठेरक (एक तुलसी का भेड़, छोटी तुलसी या मरवा) शिरिस (सिरस), लशुन (लहसुन), दोनों हरिद्रा (हल्दी एवं आमी हल्दी) दोनों लवण (सेंधा और काला) ज्योतिष्मती (मॉल कांगनी) नागर (सोंठ) इन पदार्थों का नस्य शिरोविरेचन के लिए प्रयोग करना चाहिए, जब सर में भारी हो, दर्द हो, पीनस रोग हो, आधा सीसी हो, नाक में या मस्तिष्क में क्रीमी रोग हो, अपस्मार (हिस्टीरिया)  नाक से सुंगंध आना रूक गया हो या मूर्छा फिट आती हो. तब शिरोविरेचन के लिए उपर्युक्त का प्रयोग करना चाहिए.   
जारी है.................


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शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

महर्षि चरक एवं चरक संहिता-१६-औषध एवं वैद्य कैसा हो?

गतांक से आगे.................. 
यथा विषं यथा शस्त्रं यथाग्निरशनिर्यथा.
तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतम यथा (१२४)
अमृत और विष औषध- बिना जागा हुआ औषध, वैसा ही है, जैसे विष,या जैसे आग, या जैसे बिजली है. वे बिना ज्ञान के ही मृत्यु का कारण होते हैं. और विशेष रूप से जान हुआ औषध अमृत जैसे होता है, जिस औषध के विषय में नाम, रूप, और गुणों का ज्ञान नहीं है, जानकारी नहीं है, या जान कर भी  दुरूपयोग होता है तो वह अनर्थकारी हो जाता है. उत्तम रीती से प्रयोग करने पर तो तीक्ष्ण विष भी उत्तम औषधि हो जाता है. औषध का भली भांति प्रयोग ना करें तो वह तीक्ष्ण विष के सामान प्राण घातक हो जाता है. इस लिए बुद्धि मान रोगी जो जीवन और आरोग्य चाहता है. वह प्रयोग-ज्ञान से शून्य वैद्य की दी हुयी कुछ भी औषध ना लेवे. 
इन्द्र का वज्र सर पर गिरे तो जीवन बचा रह सकता है. परन्तु अज्ञानी वैद्य दिया औषध प्राण हरण कर लेता है. जो वैद्य अपने को बहुत बुद्धिमान मानकर  गर्व से औषध को बिना जाने  ही दुखी: सोते हुए, श्रद्धावान , विश्वासी रोगी को औषध दे देता है, ऐसे धर्महीन, पापी, दुरमति, मृत्यु के अवतार वैद्य से तो बात करने में भी मनुष्य नरक में गिर जाता है, भयंकर जहरीले सांप का विषपान करना अच्छा है, या आग में तपे लोहे की लाल -लाल गोलियां गटक जाना अच्छा है, परन्तु  विज्ञ विद्वान् वैद्यों का चोला पहनकर शरण में आये रोग पीड़ित व्यक्ति से अन्न, पान, या धन ग्रहण करना  अच्छा नहीं है.
वैद्य के कर्त्तव्य- इसलिए जो बुद्धिमान अपने उत्तम गुणों के आधार पर वैद्य होना चाहता है. वह ऐसा उत्तम यत्न करे कि लोगों को प्राण देने वाला सिद्ध हस्त वैद्य बने. वही औषध उत्तम है जो रोगी को रोग रहित करने में सफल होता है. और वही वैद्यों में उत्तम वैद्य है जो रोगी को रोगों से मुक्त करने में समर्थ हो. चिकित्सा कर्मो की सफलता ही वैद्य के उत्तम प्रयोग को बतलाती है., और सफलता ही उत्तम वैद्य को सर्वगुणों से संपन्न बतलाती है.
जारी है.........................
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शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

महर्षि चरक एवं चरक संहिता-१5,सर्वोत्तम वैद्य

गतांक से आगे...........
औश्धिर्नामरुपाभ्याम जानते ह्यजपा वने
अविपाश्चैव गोपश्च ये चान्ये वनवासिन: (१२०)
औषधियों के नाम और रूप तो वन में भेड़, बकरी गौवें चराने वाले गडरिये, और ग्वाले और अन्य जंगल में विचरण करने वाले जंगली आदमी भी जाना करते हैं. केवल नाम जान लेने और रूप रंग से औषधि पहचान लेने मात्र से कोई भी औषधियों के श्रेष्ठ प्रयोग का ज्ञाता नहीं हो जाता, जो व्यक्ति इन औषधियों का प्रयोग जाने, और इनका रूप पहचाने , वह "तत्व वेत्ता" कहा जाता है. इस पर भी जो भिगक (वैद्य) औषधियों को सब प्रकार से जाने उस वैद्य का क्या कहना? देश, काल के अनुसार  पुरुष अर्थात भिन्न- भिन्न रोगी को देख कर तदनुसार उनका उपयोग करना जाने उसको "भिष्क्तम" अर्थात सर्वोत्तम वैद्य जानना चाहिए. 

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