शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2009

महर्षि चरक एवं चरक संहिता-१5,सर्वोत्तम वैद्य

गतांक से आगे...........
औश्धिर्नामरुपाभ्याम जानते ह्यजपा वने
अविपाश्चैव गोपश्च ये चान्ये वनवासिन: (१२०)
औषधियों के नाम और रूप तो वन में भेड़, बकरी गौवें चराने वाले गडरिये, और ग्वाले और अन्य जंगल में विचरण करने वाले जंगली आदमी भी जाना करते हैं. केवल नाम जान लेने और रूप रंग से औषधि पहचान लेने मात्र से कोई भी औषधियों के श्रेष्ठ प्रयोग का ज्ञाता नहीं हो जाता, जो व्यक्ति इन औषधियों का प्रयोग जाने, और इनका रूप पहचाने , वह "तत्व वेत्ता" कहा जाता है. इस पर भी जो भिगक (वैद्य) औषधियों को सब प्रकार से जाने उस वैद्य का क्या कहना? देश, काल के अनुसार  पुरुष अर्थात भिन्न- भिन्न रोगी को देख कर तदनुसार उनका उपयोग करना जाने उसको "भिष्क्तम" अर्थात सर्वोत्तम वैद्य जानना चाहिए. 

जारी है...........


4 टिप्पणियाँ:

Pandit Kishore Ji on 23 अक्तूबर 2009 को 9:05 am ने कहा…

charak samhita ke itne behatrin shodh ke liye badhai sweekar kare sachmuch behad jyada jaankario se bhara yah lekh bahut pasnd a raha hain
http/jyotishkishore.blogspot.com

Nirmla Kapila on 23 अक्तूबर 2009 को 10:10 am ने कहा…

आज कल तो नीम हकीम ही तत्व वेता बने घूम रहे हैं । बहुत ग्यानप्रद पोस्ट है धन्यवाद्

Dewlance हिन्दी होस्टिंग on 23 अक्तूबर 2009 को 11:23 am ने कहा…

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