शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

महर्षि चरक एवं चरक संहिता-५ वात-पित्त-कफ के गुण

गतांक से आगे-
रुक्ष: शीतो लघु: सुक्ष्मश्चलोSथ विषद: स्वर:
विपरीतगुनैद्रव्यर्मरुत: स्न्प्रशाम्यती  (५९)
साधनं नत्व्साध्यानाम व्याधिनामुपदिश्यते
भुयाश्चातो यथाद्रव्यम गुणकर्म प्रवक्ष्यते (६३)

वात के गुण -वायु रुक्ष(रुखा) शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विषद और खर होता है, वह इससे विपरीत गुण वाले द्रव्यों से शांत हो जाता है.
पित्त के गुण- पित्त स्नेह सहित(चिकना), गरम, तीखा(कडुआ) द्रवरूप, खट्टा,  सर (गतिशील, दस्तावर, फैलने वाला) और कटु होता है, वह इससे विपरीत गुण वाले द्रव्यों से शांत होता है,
कफ के गुण- कफ गुरु(भारी) शीत, मृदु , स्निग्ध(चिकना) मधुर (मिठास लिए) स्थिर, पिच्छल(फिसलना) होता है, कफ के गुण विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शांत होते है,
देश, मात्रा, काल के अनुसार विपरीत गुणों वाली औषधियों से साध्य माने गये विकार(रोग) ही दूर होते हैं, असाध्य व्याधियों को अच्छा करने का उपाय इस शास्त्र में उपदेश नही किया गया  है. अर्थात एक सीमा से परे रोग असाध्य हो जाता है तो उसकी चिकित्सा नही हो सकती.
रसनार्थो रसस्तस्य: द्र्व्य्माप: क्षितिस्तथा.
निवृत्तौ च, विशेषे च प्रत्यया: खाद्य्स्त्राया: (६४)
स्वदुर्म्लोSथ लवण: कटुकस्तिक्त एव च.
कशायाश्चेती षटकोSयं  रसानां संग्रह: स्मृत:(६५)
रस - रस रसना- अर्थात जिव्ह्या का विषय है, रस गुण का आश्रय आप:(जल) और भूमि(पृथ्वी) दोनों हैं, और जल और पृथ्वी ही रस की प्रतीति के कारण हैं, शेष अग्नि, वायु और आकाश तीनों विशेष रस प्रतीति के निमित्त कारण बन जाते हैं,
स्वादु-(मधुर),अम्ल, (खट्टा) लवण(नमकीन) कटुक(मिर्चिकासा चरचरा) तिक्त(नीम के सामान कडुआ) और कषाय ( कसैला बहेडे  के सामान) ये छ: रस संक्षेप से कहे गये है,
मदुर,अम्ल, और लवण ये वायु (वात) को शांत करते हैं, कषाय और तिक्त ये पित्त को शांत करते  हैं, कषाय, कटु और तिक्त ये कफ का शमन करते हैं.
स्वाद लेने वाली इन्द्री रसना है, उसका ग्राह्य विषय रस है, भद्र काप्पीय (सु.अ.२६) में सौम्य: ख्ल्वाप:. कहा है, सुश्रुत में - आप्यो: रस. जल के रस से ही पृथ्वी भी रसवती कहलाती है, पृथ्वी, जल्दी भूत परस्पर मिले रहते हैं, विष्टम ह्रापरम् परेण. इस कारण से सोम गुण अधिक होने से मधुर रस, पृथिवी और अग्नि की अधिकता से अम्ल, इत्यादि रस होते हैं, इन्ही के कम या जायदा होने को ही मधुर एवं मधुरतम  कहा है, जल स्वयम अव्यक्त रस है, पृथ्वी के सम्बन्ध से रस की अभिव्यक्ति होती है, यास्क का कथन है- सर्वेरसा: पानीयमनु  प्राप्ता:..
जारी है..........................

3 टिप्पणियाँ:

sweet_dream on 10 अक्तूबर 2009 को 11:31 am ने कहा…

क्या बात है बहुत दिनों बाद आज सब जगह अच्छा पढने को मिल रहा है आपके लक्ष्य के लिए मेरी दुआएं साथ है

जी.के. अवधिया on 10 अक्तूबर 2009 को 12:10 pm ने कहा…

ज्ञानवर्धक लेखमाला!

Nirmla Kapila on 10 अक्तूबर 2009 को 7:44 pm ने कहा…

ये ब्लाग तो मैने देखा ही नहीं था जहाँ तो ग्यान बिखरा पडा है बारी बारी से खाली समय मे पढती हूँ धन्यवाद्

 

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