बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

महर्षि चरक एवं चरक संहिता (४)-त्रिदोष क्या हैं?


गतांक से आगे--
निर्विकार: परस्वात्मा सत्त्वभूतगुणेइन्द्रियों,
चैतन्ये कारणम नित्यो द्रष्टा पश्यति हि क्रिया: (५६)
अर्थात मन एवं शरीर दोनों से परे सूक्ष्म आत्मा स्वत: निर्विकार है,उसमे रोग आदि नहीं होते, वह आत्मा ही सत्व अर्थात मन,भूतों के गुण,शब्द गंध, रूप रस, स्पर्श और इनके ग्रहण करने वाली इन्द्रियों के साथ रहकर शरीर की चेतना का मूल कारण है,वह आत्मा नित्य है,वह शरीर में होने वाली सभी क्रियाओं का दृष्टा अर्थात साक्षी है,वह उन सबको देखता है,
वायु: पित्तं कफ्श्चोक्त: शरीरो दोषसंग्रह:.
मानस: पुन्रुद्धिष्टो रजश्च तम एव च . (५७)
प्रशाम्यत्योश्धि: पूर्वो दैव्युक्तिव्यपश्रयै:
मानसों ज्ञानविज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधीभि:(५८)
त्रिदोष - वायु (वात),पित्त और कफ, ये तीन शरीर गत दोष हैं,रज और तम ये मन के दोष हैं, शरीर गत दोष ,दैव, और युक्ति का सहारा लेकर सेवन किये गए औषधियों से शांत  हो जाता है,और मानस का दोष ज्ञान-विज्ञान,धैर्य समृति और समाधि  के अभ्यास से शांत होता है, दैव अर्थात धर्माधर्म,अदृष्ट,का आश्रय लेकर बलि मंत्र,मंगल अदि से रोग शांत किये जाते हैं, युक्ति योजना, हितकारी योग, देकर शरीर के मलों को शोधना आदि,ज्ञान-अध्यात्मज्ञान,विज्ञानशास्त्र-ज्ञान,धैर्य चित्त की स्थिरता, स्मृति पुनार्नुभावों  का स्मरण, समाधी विषयों से चित्त को हटाकर परमार्थ में लगाना,
 वात-पित्त-कफ-इन तीनो को धातु भी कहा गया है, रोग के ये तीन प्रधान कारण होने से इनको दोष भी कहा गया है, आगे इनकी चर्चा विस्तार के साथ होगी अभी प्रारम्भिक जानकारियों पर ही चल रहे हैं,८० वातज विकार-४०पित्तविकार-२० कफ विकार हैं, इनका सम रहना ही आरोग्य है,शोणित या रक्त को दोष कहा है,तो भी रक्तादी के दूषण में भी वायु आदि का संसर्ग ही कारण होने से यहाँ दोष संग्रह में रक्त का नाम नही लिया, इसी प्रकार मान्सादि धातुओं में भी होता है.
जारी है...............

1 टिप्पणियाँ:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ on 7 अक्तूबर 2009 को 12:06 pm ने कहा…

उपयोगी जानकारी दी है, आभार।
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बोटी-बोटी जिस्म नुचवाना कैसा लगता होगा?

 

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