सोमवार, 12 अक्तूबर 2009

महर्षि चरक एवं चरक संहिता-८ फलिनी औषधियां

गतांक से आगे...
श्वेता ज्योतिष्मती चैव योज्या शीर्ष विरेचने.
एकादशावशिष्टा या: प्रयोज्यास्ता  विरेचन:(७९)
इत्युक्ता नामकर्मभ्यम मूलिन्य:,
सोलह मुलिनियों का प्रयोग - शण पुष्पी,विम्बी, हैमवती (वचा), इनका प्रयोग मूल वमन में किया जाता है, श्वेता (सफ़ेद कोयल) और ज्योतिष्मती (मॉलकांगनी) इनका मूल शिरोविरेचन  के लिए प्रयोग करना चाहिए. शेष जो ग्यारह बची उनका मूल विरेचन के लिए प्रयोग करना चाहिए. ये नाम एवं कर्म सहित १६ मुलिनियाँ हैं.इन सबका मूल (जड़) काम में आने के कारण  इनको मूलिनी वर्ग में गिना जाता है.
फलिनी: श्रणु (८०)
शंखिन्याथ विडअन्गानि त्रपुर्ष  मदनानि च.
आनुपं स्थलज्म चैव क्लित्कम  दिविधिम स्मृतं.(८१)
फलिनी- अब फलिनी औश्दियों के विषय में चर्चा करते हैं. १.शंखिनी( यवतिक्ता या चौर्पुश्पी) २.विडंग (बायविडंग), ३.त्रशुप (खीरा, हठी) ४.मदन (मैन फल) ५.आनूप क्लीतक (जलज मूलहठी), ६.स्थलक क्लीतक (भूमि में पैदा होने वाली मूल हठी) ७.प्रक्रियां ( करन्जुवा, लता करंज, कंजा) ८.उद्किर्या (वृक्ष करंज) ९.प्रत्यक पुष्पी (अपामार्ग,औंगा, चिरचिटा, पूठा कंड) १०. अभय (हरड)११. अंत: कोटर पुष्पी (नील चुन्हा या घाव पत्ता) १२ हस्तीपर्णी ( तिक्त कर्कटी मोरट का शरद ऋतू में फलने वाला फल) १३.काम्पिल्ल  (कमीला) १४.आरग्वध( अमलताश)१५.कुटज (कूड़ा का फल ), १६.धामागर्व (पीले फुल की घोषा लता) १७ . इक्ष्वाकु (कड़वी तुम्बी) १८. जीमूत (देवलाली, बंदाल) १९. कृत्वेधन(कोशातकी, एक प्रकार की तुराई) ये १९ औषधियां फलिनी हैं.
उपयोग- धामागर्व, इक्ष्वाकु, जीमूत, कृत्वेधन, मदन, कुटज, त्रपुष, हस्तीपर्णी, इनके फलों का प्रयोग वमन तथा आस्थापन अर्थात रुक्षवस्ति में करना चाहिए और नासिका से शिरोवेच अर्थात नास्य लेने में प्रत्यकपुष्पी (अपामार्ग) का प्रयोग करना चाहिए. शेष जो जो दस रही उनका प्रयोग विरेचन (दस्त लेने) में करना चाहिए. इस प्रकार नाम एवं कर्म सहित फलिनी औषधियों के १९ फलों का उपदेश किया गया.
जारी है.........................



1 टिप्पणियाँ:

गिरीश पंकज on 12 अक्तूबर 2009 को 11:31 am ने कहा…

charak sanhita ko lokpriy karna zaroori hai. blog ek achchha madhyam hai. badhai

 

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