शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

महर्षि चरक एवं चरक संहिता-१६-औषध एवं वैद्य कैसा हो?

गतांक से आगे.................. 
यथा विषं यथा शस्त्रं यथाग्निरशनिर्यथा.
तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतम यथा (१२४)
अमृत और विष औषध- बिना जागा हुआ औषध, वैसा ही है, जैसे विष,या जैसे आग, या जैसे बिजली है. वे बिना ज्ञान के ही मृत्यु का कारण होते हैं. और विशेष रूप से जान हुआ औषध अमृत जैसे होता है, जिस औषध के विषय में नाम, रूप, और गुणों का ज्ञान नहीं है, जानकारी नहीं है, या जान कर भी  दुरूपयोग होता है तो वह अनर्थकारी हो जाता है. उत्तम रीती से प्रयोग करने पर तो तीक्ष्ण विष भी उत्तम औषधि हो जाता है. औषध का भली भांति प्रयोग ना करें तो वह तीक्ष्ण विष के सामान प्राण घातक हो जाता है. इस लिए बुद्धि मान रोगी जो जीवन और आरोग्य चाहता है. वह प्रयोग-ज्ञान से शून्य वैद्य की दी हुयी कुछ भी औषध ना लेवे. 
इन्द्र का वज्र सर पर गिरे तो जीवन बचा रह सकता है. परन्तु अज्ञानी वैद्य दिया औषध प्राण हरण कर लेता है. जो वैद्य अपने को बहुत बुद्धिमान मानकर  गर्व से औषध को बिना जाने  ही दुखी: सोते हुए, श्रद्धावान , विश्वासी रोगी को औषध दे देता है, ऐसे धर्महीन, पापी, दुरमति, मृत्यु के अवतार वैद्य से तो बात करने में भी मनुष्य नरक में गिर जाता है, भयंकर जहरीले सांप का विषपान करना अच्छा है, या आग में तपे लोहे की लाल -लाल गोलियां गटक जाना अच्छा है, परन्तु  विज्ञ विद्वान् वैद्यों का चोला पहनकर शरण में आये रोग पीड़ित व्यक्ति से अन्न, पान, या धन ग्रहण करना  अच्छा नहीं है.
वैद्य के कर्त्तव्य- इसलिए जो बुद्धिमान अपने उत्तम गुणों के आधार पर वैद्य होना चाहता है. वह ऐसा उत्तम यत्न करे कि लोगों को प्राण देने वाला सिद्ध हस्त वैद्य बने. वही औषध उत्तम है जो रोगी को रोग रहित करने में सफल होता है. और वही वैद्यों में उत्तम वैद्य है जो रोगी को रोगों से मुक्त करने में समर्थ हो. चिकित्सा कर्मो की सफलता ही वैद्य के उत्तम प्रयोग को बतलाती है., और सफलता ही उत्तम वैद्य को सर्वगुणों से संपन्न बतलाती है.
जारी है.........................

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