रविवार, 11 अक्तूबर 2009

महर्षि चरक एवं चरक संहिता-६, द्रव्य क्या हैं? वर्गीकरण

गतांक से आगे............
किन्चिद्दोषप्रशमनं किन्चित्द्धातु प्रदुषणम. 
स्वस्थवृत्तौ हितं किंचित त्रिविधं द्रव्य मुच्यते (६७)
अब आगे हम द्रव्यों के विषय में चर्चा करेंगे,
त्रिविध द्रव्य- द्रव्य तीन प्रकार के होते हैं
१.कोई द्रव्य दोष को शांत करता है,२. कोई द्रव्य धातुओं को दूषित करता है,३.कोई द्रव्य स्वस्थ रहने में हितकारी है , इस प्रकार से द्रव्यों के तीन प्रकार बताये गये हैं, इन तीनो प्रकार के द्रव्यों के और तीन प्रकार हैं 
१. जंगम २.औद्भिद ३.पार्थिव 
१.जंगम वे पदार्थ हैं जो जंगम अर्थात चार प्राणियों के शरीर से उत्पन्न होते हैं, जैसे- नाना प्रकार के मधु(शहद),नाना प्रकार के प्राणियों से उत्पन्न हुए दूध, पित्त, चर्बी, मज्जा, रुधिर, मांस, मल, मूत्र, चमड़ा, वीर्य, हड्डी, स्नायु, अनेक प्रकार के सींग, खुर, नख, केश, रोम, और रोचानाएं, ये द्रव्य जंगम प्राणियों से प्राप्त करके उपयोग में लाये जाते हैं,
२.पार्थिव या भौम- ये पदार्थ पृथ्वी या भूमि से प्राप्त होते हैं, जैसे- सुवर्ण,  मल सहित पांचों प्रकार के लौह धातु, सिकता (बालू) सुधा(चुना) मनशिला(मैनसिल) आल (हरिताल) अनेक प्रकार की मणियाँ (रत्नं) लवण(नमक) गेरू, अंजन( सुरमा-एन्टिमनी) इनको भौम या पार्थिव औषध कहा गया है,
३.औद्भिद- जो द्रव्य उद्भिद अर्थात पृथ्वी को भेद कर उत्पन्न होने वाले वृक्षों से  प्राप्त होता है उसे औद्भिद कहते हैं, ये चार प्रकार का है,१. वनस्पति,२.वीरुध,३.वानास्पत्स्य, ४.औषधि 
वनस्पति के वे वृक्ष हैं जिनमे फल लगें पुष्प ना आवें, जैसे-पीपल, अंजीर, गुलर,आदि , जिनमे फुल आवें और फल भी लगे वे वानास्पत्स्य हैं-जैसे आम, अमलताश आदि, औषधि वे हैं जो फल पकने के बाद सूख कर नष्ट हो जाती हैं, वीरुध वे हैं जिनमे प्रतान अर्थात फैलने से सूत या तंतु निकलते हों, जैसे-- लताएँ, वेलें, तरबूज आदि,
इन चारों प्रकार के औद्भिदों से जो द्रव्य प्राप्त होते हैं वे हैं- मूल,(जड़) त्वग( छाल), सार(बीच की कड़ी लकडी), निर्यास(गोंद), नाल( डंडी आदि) स्वरस(इनको निचोड़ कर निकला गया द्रव्य) पल्लव(नये कोमल पत्ते), क्षार(खार), क्षीर दूध,फल,पुष्प (फुल), भस्म (राख), इनसे अनेक प्रकार के तेल, कांटे, पत्ते, शुंग (पत्तों की अंकुआ), कंद और प्ररोह (नए-नए अंकुर या जटा) ये सब औद्भिद गण हैं,
दोषों के शामक जैसे-अमला, कंटकारी, आदि, दूषक जैसे-यवक  मंदक आदि विष, स्व्स्थ्क वृत्ति कर जैसे वृष्य रसायन आदि, यद्यपि दोष शामक पदार्थ भी कभी दूषक हो जाते हैं, जैसे अधिक आमला के सेवन से अग्नि मंद हो जाती है, धातु दूषक विष भी दोष हर होते हैं,-विषम उदरहरम. इनका भी मिथ्या योग,अयोग,अतियोग, ही निंदनीय है, प्राय: जो पदार्थ जैसा है, वैसा मानना चाहिए, मणि के रहते अग्नि भी दाहक नहीं होता, इससे उसका दाहक गुण नष्ट नहीं होता इसी से इन्द्रियों को दोष्नाशक आदि प्रायिक देखना चाहिए. जंगमों में रोचना (गोरोचना) आदि पदार्थ विशेष रूप से  उत्त्पन्न होते हैं, पर्थिवों में पॉँच धातु ताम्र(ताम्बा), रजत (चाँदी), त्रपु (टीन), शीश (सीसा) कृष्णालोह (लोहा), हैं,. "मल" शब्द से शिलाजतु  (शिलाजीत), और लोहादि के जंग लिए जाते हैं. सुश्रुत ने ६ प्रकार के  मल शिलाजतु  कहे हैं, रसायन में चार कहे गए हैं.
जारी है........................ महर्षि  एवं चरक संहिता-६, द्रव्य क्या हैं?

1 टिप्पणियाँ:

Nirmla Kapila on 11 अक्तूबर 2009 को 11:23 am ने कहा…

ापकी इस साधना को नमन मेरे पिता जी जाने माने वैद्य और हिकमत के माहिर थे इस लिये बहुत कुछ समझ आता है आभार्

 

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